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उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृतिक चेतना का प्रतीक जागर केवल गीत नहीं -डॉ शची

रिपोर्ट — कृष्णा रावत डोभाल

देहरादून :उत्तराखंड की लोक- धार्मिक परंपरा जागर की वर्तमान स्थिति और बदलते स्वरूप पर देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान बिट्ूसपिलानी में चर्चा हुई। उत्तराखंड की शोधकर्ता और सांस्कृतिक अध्येता डा. शची नेगी ने 7 और ৪ फरवरी को पिलानी कैंपस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जागर पर आधारित अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संस्कृति, प्रस्तुति और सांस्कृतिक स्मृति जैसे विषयों पर कैंद्रित रहा, जिसमें भारत सहित यूके, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया  से आए विद्वानों और शोधार्थियों ने भाग लिया।सम्मेलन सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और उनकी सामाजिक भूमिका पर शोध आधारित प्रस्तुतियां दी गई।डा. शची नेगी ने अपने शोध में बताया कि जागर उत्तराखंड में केवल एक लोकगीत नहीं,बल्कि देवी-देवताओं और पूर्वजों के आवाहन से जुड़ी एक पवित्र,और उपचारात्मक परंपरा हैं।उन्होंने कहा कि शहरीकरण और लोकप्रिय संस्कृति के प्रभाव में आज जागर का स्वरूप बदल रहा है और कई स्थानों पर इसे सिर्फ मनोरंजन के रूप  में प्रस्तुत किया जाने लगा है। उन्होंने डीजे शैली में जागर प्रस्तुत किए जाने पर चिंता जताई और कहा कि इससे अक्षरी जागर और देवी जागर जैसी परंपराओं की धार्मिक गरिमा प्रभावित होती है। गांवों में आज भी जागर को आस्था,शुभता और उपचार से जुड़ी परंपरा के रूप में देखा जाता है।शोध के निष्कर्ष में कहा कि किसी सांस्कृतिक परंपरा को लोकप्रिय बना देना ही उसका संरक्षण नहीं है। परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाकर ही सांस्कृतिक विरासत को उसकी मूल आत्मा के साथ सुरक्षित रखा जा सकता है।

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